जीएसटी परिषद की 55वीं बैठक में वाउचर को लेकर अहम फैसला लिया गया। परिषद ने माना कि वाउचर का लेन-देन न तो माल की आपूर्ति है और न ही सेवा। इसलिए जीएसटी के तहत इन पर कोई कर नहीं लगेगा। इस फैसले से वाउचर की कराधान स्थिति को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद खत्म हो जाएंगे।
बता दें कि नए ब्रांड आमतौर पर अपने उत्पादों के प्रचार के लिए वाउचर का इस्तेमाल करते हैं। खरीद पर यूजर्स को वाउचर का लालच दिया जाता है, ताकि उत्पाद की बिक्री बढ़ सके। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब रिटेल सेक्टर लगातार वाउचर पर स्पष्टता की मांग कर रहा था। इससे पहले कर्नाटक अथॉरिटी (एडवांस रूलिंग) ने प्रीमियर सेल्स कॉर्प के मामले में वाउचर को कमोडिटी और टैक्सेबल घोषित किया था। अब इस नए फैसले से उन कंपनियों और रिटेल कारोबारियों को राहत मिलेगी, जो प्रचार के लिए वाउचर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं।
जीएसटी परिषद के लॉ पैनल की सिफारिशों के आधार पर यह फैसला लिया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वाउचर को “प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट्स” के रूप में परिभाषित किया गया है। इन वाउचर का इस्तेमाल आम तौर पर भुगतान निपटाने के लिए किया जाता है और इन्हें “कार्रवाई योग्य दावों” की श्रेणी में रखा जा सकता है। नियम के मुताबिक, जीएसटी कार्रवाई योग्य दावों पर भी लागू नहीं होता है। इसलिए इस पर भी इसे लागू नहीं किया गया है।
बैठक में काउंसिल ने वाउचर के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी विचार किया। इनमें बीमा उत्पादों पर कर कटौती, पुराने इलेक्ट्रिक वाहनों पर जीएसटी दरों में वृद्धि और घड़ियों, पेन और जूतों जैसी विलासिता की वस्तुओं पर कर ढांचे का पुनर्गठन शामिल है।

