अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लगातार चौथे साल 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हासिल करना चुनौतीपूर्ण होगा। उन्होंने बताया कि 29 नवंबर को घोषित दूसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों ने सरकार के लिए यह काम और भी कठिन बना दिया है।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी के मुताबिक दूसरी तिमाही में उम्मीद से अधिक वृद्धि में मंदी ने चालू वित्त वर्ष के लिए हमारे 6.8 प्रतिशत के दृष्टिकोण के जोखिम को कम कर दिया है। विनिर्माण, उपयोगिताओं और खनन में मंदी और सरकारी पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में कमी के कारण वित्तीय वर्ष (FY) 2025 की दूसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 5.4 प्रतिशत बढ़ी।
वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक वृद्धि औसतन 6 प्रतिशत रही। 7 प्रतिशत तक पहुँचने के लिए, 31 मार्च को समाप्त होने वाली शेष दो तिमाहियों में 8 प्रतिशत की वृद्धि की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों ने संकेत दिया कि सरकार के 6.5-7 प्रतिशत अनुमान के निचले सिरे तक वृद्धि की संभावना भी मुश्किल हो सकती है।
यूबीएस की मुख्य भारत अर्थशास्त्री तन्वी गुप्ता जैन के मुताबिक सितंबर तिमाही में अपेक्षा से कम वृद्धि को देखते हुए, हम उम्मीद करते हैं कि भारत का वित्त वर्ष 25 का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद साल-दर-साल 6.3 प्रतिशत रहेगा, पहले 6.7 प्रतिशत का अनुमान था। वहीँ एमके ग्लोबल की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा का कहना है कि आगे संभावित क्रमिक सुधार के बावजूद, हम विनिर्माण में मंदी और उपभोग की कहानी के बीच अपने सकल घरेलू उत्पाद के पूर्वानुमान को 50 आधार अंकों से घटाकर 6 प्रतिशत जो पहले 6.5 प्रतिशतथी, कर रहे हैं।”

