फिस्क्ड इनकम ऑप्शन में सबसे अच्छे और बुरे विकल्प में 1.5-2.0% का फर्क होता है। लोग इन बातों पर ध्यान नहीं देते लेकिन 2% सालाना का फर्क दो दशक में बढ़ता हुआ निवेश में 50% तक का फर्क पैदा कर सकता है।
आप कहेंगे कि कोई भी 20 साल के लिए निवेश नहीं करता लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। कोई भी निवेश दो या तीन साल से ज्यादा नहीं चलता लेकिन ज्यादातर लोग साल दर साल, दशक दर दशक फिक्स्ड इनकम ऑप्शन में मोटी रकम लगाते रहते हैं। इसलिए, सेविंग्स के तौर पर हेवी रिटर्न से हाथ धोने का खतरा हर शख्स के साथ बना रहता है।
ज्यादा से ज्यादा रियल पोस्ट टैक्स फिक्स्ड इनकम गेंस हासिल करने का बेस्ट तरीका बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट से फिक्स्ड इनकम म्यूचुअल फंड में शिफ्टिंग हो सकता है। कुछ खास तरह के डेट फंड्स में मची उथल-पुथल के बावजूद सबसे कम अवधि के डेट फंड सबसे सुरक्षित बने हुए हैं और फिक्स्ड डिपॉजिट के मुकाबले बहुत ज्यादा बेनिफिट दिलाते हैं। निवेश के तीनों पहलुओं- रिटर्न, लिक्विडिटी और टैक्सेशन के हिसाब से ये बेहतर होते हैं।
बैंकों के एफडी से उलट ओपन एंडेड इनकम फंड में किया जानेवाला निवेश, रिटर्न के साथ समझौता किए बिना एक दिन के नोटिस पर कभी भी रिडीम किया जा सकता है। इसके अलावा, इनमें निवेशकों को यह तय नहीं करना पड़ता है कि उन्हें कितने समय के लिए निवेश करना है।
आमतौर पर इनसे मिलने वाला रिटर्न समय के साथ बढ़ता हुआ फिक्स्ड डिपॉजिट से एक पर्सेंट ज्यादा हो जाता है। टैक्सेशन में फर्क को दरकिनार कर दें तो भी छोटे-छोटे फायदे इन्हें आकर्षक बना देते हैं।
लेकिन टैक्सेशन में फर्क का गहरा असर होता है। यह दो तरह का है- पहला कम टैक्स रेट और दूसरा TDS। दोनों को मिलाकर देखें तो इनका असर बहुत ज्यादा होता है। म्यूचुअल फंड से हासिल होनेवाला रिटर्न टैक्स लॉ के तहत कैपिटल गेंस माना जाता है। इसके उलट, डिपॉजिट पर हासिल होने वाला इंट्रेस्ट इनकम माना जाता है और टैक्सपेयर के टैक्सेबल इनकम में जुड़ जाता है। इंट्रेस्ट इनकम के मामले में टैक्सपेयर को उस पर हर साल की आमदनी की तरह टैक्स देना पड़ता है, चाहे आपने उसे भुनाया हो या फिर वह डिपॉजिट में लगता रहता हो।
बैंक इस इनकम पर TDS काटता है। अगर बैंक से हासिल होनेवाली आपकी इंट्रेस्ट इनकम 10,000 रुपये सालाना से ज्यादा होती है तो बैंक उस पर 10% का TDS काट लेता है। इसका मतलब यह हुआ कि रिटर्न के पार्ट पर आपको चक्रवृद्धि दर से बढ़ोतरी का फायदा नहीं मिल पाएगा, क्योंकि यह टैक्स के तौर पर हर साल कट जाता है। इससे इन्वेस्टमेंट पीरियड के बाद हासिल होनेवाले रिटर्न पर गहरा असर होता है।
बात यहीं खत्म नहीं होती। अगर आप तीन साल से ज्यादा समय तक निवेश में बने रहते हैं तो उसका गेन लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा। उस पर टैक्स इन्फ्लेशन इंडेक्सेशन के बाद ही देना होगा, जो FD में नहीं होता, क्योंकि उससे हासिल होनेवाला ब्याज सामान्य आय माना जाता है।
इन सभी फर्क को ध्यान में रखते हुए शॉर्ट टर्म डेट फंड में लगाए जाने वाले तीन साल के निवेश का एक्चुअल पोस्ट-टैक्स रिटर्न दूसरे ऑप्शन के मुकाबले लगभग दोगुना बैठेगा। ज्यादातर बचतकर्ताओं के लिए यह ट्रैजेडी है, जो फिक्स्ड इनकम ऑप्शंस में मोटी रकम निवेश करने के बावजूद उससे बेस्ट रिटर्न हासिल नहीं कर पाते हैं।

