नई दिल्ली: लॉकडाउन के दो हफ्ते बाद भी ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए बिजनेस को पटरी पर ला पाना संभव नहीं हो सका है। नॉन-एसेंशियल सामान की ढुलाई और कर्फ्यू पास में रियायतों के बाद भी न तो उनके वेयरहाउस ऑपरेट कर पा रहे हैं और न ही डिलिवरी बॉय मिल रहे हैं। सिर्फ ग्रॉसरी बेचने वाली कंपनियां कुछ हद तक मार्केट में टिकी हैं, लेकिन फ्लिपकार्ट और एमेजॉन जैसी बड़ी ईटेलर्स के लिए लॉकडाउन में काम कर पाना मुश्किल हो गया है। मार्केट रिसर्चर्स और रिटेल कंसल्टेंट्स का मानना है कि ई-कॉमर्स तभी सामान्य होगा, जब सप्लाई चेन के सभी पॉइंट्स खुल जाएंगे।
मार्केट रिसर्च फर्म फॉरेस्टर के सीनियर एनालिस्ट सतीश मीणा ने कहा, ‘फिलहाल ग्राहकों की ओर से जरूरी चीजों की ही डिमांड आ रही है और बड़े ईटेलर्स के पास इनकी इनवेंटरी नहीं है। लॉकडाउन की बंदिशों के चलते वे अपने वेयरहाउसेज से भी कनेक्ट नहीं कर पा रहे और न ही उनके पास ग्रॉसरी स्टोरेज की क्षमता है। 70% डिलिवरी वर्कफोर्स गायब है, ऐसे में वे दूसरी चीजों की डिमांड आने पर भी ग्राहकों तक नहीं पहुंचा सकते।’ उन्होंने बताया कि कम से कम इस महीने तो ई-कॉमर्स में किसी सुधार की उम्मीद नहीं है। फॉरेस्टर ने हाल में अपने एक रिसर्च में दावा किया था कि लॉकडाउन से टॉप ईटेलर्स को 1 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है और सालाना ग्रोथ 5% तक लुढ़क सकती है।
रिटेल कंसल्टेंसी टेक्नोपार्क एडवाइजर्स के चेयरमैन अरविंद सिंघल ने बताया कि लॉकडाउन पूरी तरह खुलने तक कम से कम ऑनलाइन रिटेल सामान्य नहीं हो सकता। अलबत्ता फिजिकल रिटेल में भी किल्लत शुरू हो सकती है। उन्होंने कहा, ‘एसेंशियल और नॉन-एसेंशियल को परिभाषित करना व्यावहारिक नहीं है। सरकार को सभी तरह की सप्लाई बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए। इसके लिए मैन्युफैक्चरिंग, रोड ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउसिंग जैसे सभी पॉइंट्स खोलने होंगे। लॉकडाउन के बीच ही वर्कफोर्स बहाल करने के उपाय भी किए जा सकते हैं।’ उन्होंने कहा कि अगर मौजूदा बंदिशों के साथ लॉकडाउन बढ़ाया जाता है तो ग्रॉसरी की किल्लत और महंगाई भी बढ़ सकती है।

